Friday, 28 August 2026

रक्षा बंधन


रक्षाबंधन और संस्कृत दिवस
रक्षाबंधन और संस्कृत दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक जाग्रत अवस्था है, चेतना हैं। प्रकृति का संरक्षण, ज्ञान के संवर्धन, रिश्तों की मर्यादा, मानवीय गरिमा की रक्षा और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना के साथ प्रेम और सर्वकल्याणकारी समाज का निर्माण करना ही इन दोनों पर्वों का वास्तविक मर्म है।
श्रावणी पूर्णिमा का पावन अवसर भारतीय संस्कृति के दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयामों—रक्षाबंधन और संस्कृत दिवस—के सुंदर समन्वय का प्रतीक है। ये दोनों पर्व मूल रूप से सुरक्षा, मानवीय मूल्य और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का साझा संदेश देते हैं।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के आत्मीय स्नेह और सुरक्षा के संकल्प तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अधिकारों से अधिक दायित्वों का बोध कराता है। वर्तमान संदर्भ में ‘रक्षा’ के इस भाव का विस्तार रिश्तों के साथ-साथ प्रकृति, जल, पर्यावरण, नैतिक संस्कारों और संपूर्ण मानवता के संरक्षण तक को प्रबुद्ध वर्ग ने स्वीकार किया है। वहीं, संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, अपितु वेदों, उपनिषदों, आयुर्वेद और दर्शन की समृद्ध ज्ञान-परंपरा की संवाहिका है।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा विश्व संस्कृत दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1969 से हुई थी। यह हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन और श्रावणी उपाकर्म के दिन) को मनाया जाता है, क्योंकि प्राचीन काल में इसी पवित्र तिथि से गुरुकुलों में वेदों और शास्त्रों के अध्ययन का नया सत्र आरंभ होता था। साथ ही आदर्श जीवन में सीखने का संपूर्ण सार इसी में समाहित है। “सत्यमेव जयते”, “विद्या ददाति विनयम्”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसी सूक्तियाँ कम शब्दों में जीवन का शाश्वत दर्शन प्रस्तुत कर परिवार को वैश्विक महत्त्व दिलाती हैं।
वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक के युग में आगे बढ़ते हुए अपनी जड़ों से जुड़े रहना आवश्यक है; सशक्त जड़ें ही भविष्य के तूफानों में संबल बनती हैं।
आज रक्षाबंधन का पवित्र भाव कई बार दिखावे, महँगी राखियों और उपहारों की प्रतिस्पर्धा के कारण वास्तविक महत्त्व खोता जा रहा है। भाई-बहन के आत्मीय प्रेम और परस्पर सम्मान के स्थान पर बाजारवाद और औपचारिकता का प्रभाव बढ़ता दिखाई देता है। जो राखी स्नेह, विश्वास और रक्षा-संकल्प का प्रतीक थी, वही कई स्थानों पर केवल एक रस्म बनकर रह गई है। जबकि मानव समाज को इस पर्व को उपहारों की कीमत से नहीं, बल्कि रिश्तों की संवेदना और जिम्मेदारी की गहराई से मापना चाहिए। इसकी वास्तविक गरिमा तभी लौटेगी, जब राखी का धागा कलाई के साथ-साथ हृदय में प्रेम, सम्मान और संरक्षण का संकल्प भी बाँधेगा।
इसका मंत्र हर मजबूत बंधन की ओर संकेत करता है—
येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
अर्थ: जिस रक्षासूत्र से महाबली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बाँधता/बाँधती हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अपने संकल्प से विचलित न होना, विचलित न होना।
रक्षाबंधन और संस्कृत दिवस का यह समन्वय हमें स्मरण कराता है कि पर्व केवल परंपराओं के निर्वाह का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों को जाग्रत करने का अवसर हैं। रक्षा केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, ज्ञान, रिश्तों, मानवीय गरिमा और संपूर्ण समाज की होनी चाहिए। इसी व्यापक चेतना में इन दोनों पर्वों की वास्तविक सार्थकता निहित है।

Thursday, 27 August 2026

लोकगीत लिट्टी चोखा खाई दिन कटबो ए राजा जी

जोर चले भोरहीं  से पछुआ ए राजा जी
 लिट्टी-चोखा खाई दिन कटबो ए राजा जी ।

गोंइठा के ढेर करी अगिया जराइब।
आटा सानी सतुआ के भभरी बनाइब ।
तोप के पकाई राख झरबो ए राजा जी।।
लिट्टी चोखा खाई दिन कटबो ए राजा जी ।


लिटिया के संगवा में चूरमा अचार जी।
घीउवा में बोरब आपन नेहिया दुलार जी।।
आसन जमाइ कौर जिमिह ए राजा जी।।
लिट्टी चोखा खाई दिन कटबो ए राजा जी ।


लोटा भर पानी पीके राजा देखें पेयार से,
 आजु दिन सपना बा सुधि आइल पार से 
 गुइयाँ के विभोर भ‌इ चितवेली ए राजा जी।
।लिट्टी चोखा खाई दिन कटबो ए राजा जी ।।

डॉ रजनी रंजन,घाटशिला झारखंड।

Sunday, 21 June 2026

नन्हकी के माई

आज भोरही से मड़इया में  खुबे आवाजाही लागल रहे। नन्हकी के माई आज अँकवार से बाहर निकल जात रहे। बड़की चाची  जब खिसियास त उ घरी तनी घुघटा के  सरका के कहस- ए अम्मा जी! बहरिया कोई ना रहल ह। आ नन्हकी के कबे से कहत रहनी ह सुनऽते नइखे त हाली-हाली निपटारा करे खातिर ............. एतने में - 'अच्छा , अच्छा, ठीक बा। जा घरे 'बड़की चाची के  ऐलान सुनते  ऊ भीतर चल गइली।
  ए नन्हकी ! सुन ! साबुन से बढिया से मुँह धोके पउडरवा तनी लगा लीहे। अबकी तोर मुँहवा साफा लागता । ई जे एक महीनवा हरदी चनन लगइलिस नु। एही से नीक लागता। काहे से कि लइकवा तनी साफा बा।
लइका खूबे पढल- लिखल बा। सुने में आइल ह , जे उ कहले बा कि लइकिया पढ़े में तेज होई ,आ हमरा मन के उपजल सवाल के उत्तर दे दीही त ओही घरी 'हॅ' कह देब। ए पीर बाबा! ए गंगा  माई! ए देवरहवा बाबा! रउरा के गोर लागतानी। नन्हकी के  अबकी बियहवा फाइलल करा दीहीं। रउरा हमरा के बेटी दिहनी एकर दुःख हमरा नईखे लेकिन रंगवा रऊरा एकदम दब देहनी ए बात के दुःख बा। हम सेर भर लइचीदाना चढ़ाइब। शीतला माई के  मंदिल जाइब । केकर-केकर ताना केतना सुनब ।ई हमार बनावल दोष त ना ह बाकिर राउरे दिहल बा त रऊरे किरिपा करींऽ।बोलते-बोलते नन्हकी के माई के पसेरी भर लोर गिर गइल  ।

ऐ माई! ऐ नन्हकी के माई! निकल बहरी। देख । आ गइल लोग।  नन्हकी के  बाबूजी दुअरे से हाक मरलन त नन्हकी के माई के देह मे एगो अलगे किसिम के फुरती आ गइल।
आरे ए माई! कहाँ बानी। ओसरवा में जाईं। आ गइल लोग। 'ठीक बा'- कहते माई ओसारा में  बिछल खटिया पर जाके बईठ गइली। जोर से कहे लगली- एजी! हेने ले आईं । बहरिये सब बात हो जाई का? एहजी नस्तवा ठंडा जाता। माइयो अपना माथा के अँचरा तनी आगे सरकवली  आ कहते-कहते  बहरिये चल गइली। चलीं, चलीं आईं । अब  नस्ता के  संगही बातो होई।
ओकरा बाद  सब कोई  ओसारा में  आ गइल।
नन्हकी के माई जब नन्हकी के  लेके अइली त लइका ओकरा के टकटकी लगा के देखे लगलन। सब कोई ई देख के एक दोसर के मुँह देखे लागल।
नन्हकी के  माई सीन बदले खातिर कहली- आ सब अबहीं ले धइले बा ।लीहीं ना बउवा।
हूँ ऽऽ। अब आइल बानी त खाइये के  जाइब। बाकिर तनी नन्हकी  से अकेलहूँ में कुछ पूछे के बा- लइका कहलन।
एतना सुनते बाबा जोर से  कहे लगलन- ऐरू-गैरू घर के हमनी बुझतार का। परदेशी के  जोर दिहला से हम लइकियो देखइनी ह ।ना त हमनी कीहां ई सब ना चलेला। हम अपना लइकी के एतना पढवनी त लइका भी त ओइसने चाहीं। एही से तहरा के  लइकियो देखा देनी ।अब अकेले का? जे पूछे के बा एही जे पूछ लऽ।
ठीक बा। हम एही जे पूछतानी -लइका कहलन।लेकिन  रउरा लोग  बीच में बात में मत घुसब।
एकरा बाद पढाई-लिखाई के बात भइल ।नोकरी करे के विचार पर बात भइल। अंत में लइका कहलन- अच्छा!  ई बताव। एतना मुँहवा में पावडर काहे लगइले बाड़ू। ई बात सुनते नन्हकी के माई बीचे में कहे के शुरू कइली- ना हमी तनी ऽऽऽऽ?लइका बीचे में रोक दिहलन ।
रउरा तनी चुप रहीं। हम नन्हकी से पुछतानी।
नन्हकी बिना कुछ कहले लोर ढरकावे लागल। ओकर लोर से नन्हकी के माई के लोर दुगुना गिरे लागल। लइका कहलन- रोव मत। जबाब द।
नन्हकी के  मुँह से एतने बड़ी मुश्किल से निकलल- माई कहलस।
लइका कहलन- जा मुँह धो के आव।  एतना सुनते बाबा आ बाबूजी त गरम होखे लगलन। दादी बुझ गइली। उ खुदे बाहर चल गइली ।आ बोलवली- सुनतानी जी। तनी हेने आईं । ऐ बबुआ! तुहूं आव।
ऐ नन्हकी के  माई! तनी दु गिलास पानी ले आव।
सब कोई धीरे-धीरे उहां से हट गइल। नन्हकी मुँह धोके अइली त लइका कहलन- देख! हमरा बनावटी लोग आ लीपल पोतल फयसनवाला मुँहवो पसन्द नइखे। बाकिर तहार सोच हमरा बहुते पसन्द आइल । अब  हम त अइसहीं बानी। जे कहे के बा सब साफ-साफ  कहेनी। तहरा हमार बात मिजाज ठीक  लागल त बोलऽ तहरा बाबा के हम 'हँ' कह के जाइब। नन्हकी के मुँह पर मुस्कान छा गइल। उ खाली आपन अँखिये  से लइका के  सबकुछ  कह देली। ओकरा बाद  लइका कहलन- तू जा अब। फेर  भेंट होई जल्दिये।
नन्हकी के जाते सब जन भीतर आ गइलन। का ऐ बबुआ! का भईल? पूछ लेलऽ नु। दादी कहते-कहते खटिया पर फेर बिराजमान हो गइली।
लइका कहलन- हमरा त लइकी पसन्द बारी। रउरा लोग तइयारी करीं।
का? का कहतारऽ ? तहरा घर में बड़ कोई नइखे का? बाबा बीचहीं में टोक देहलन।
लइका कहलन- बारन काहे ना। सब कोई  बा ।दादी-दादा माई-बाबूजी,मामा-मामी, चाचा चाची ,बुआ, मौसी सभे बा। लेकिन  ऊ लोग भी रऊरे लोग जइसन बारन। रंगवा के  लोभ उनहूं के मन में बा। गोर ऊहो खोजिहें त फेर का होई? हमनी के त बदल रहल बानी।लेकिन रऊरा लोग के कइसे बदलल जाव? सब के माई के गोरे लइकी आ गोरे पतोह चाहीं त करिया पैदा काहे करके बड़का करेनीऽ लोग। जनमते तनी नीमक चटा देतीं त झंझटे ना होइत। गोरका के जियावल जाइत।करियका के  ओही घरी मार देवे के चाहीं। सपाट बात लइका टन से कहलस।
आज त बाबा के कड़कदार बोलिया गाएबे हो गईल रहे। चुपचाप बइठले रह गइलन। अब कोई  कुछ ना बोलत रहे।  सब चुपचाप। ऊहां सन्नाटा पसर गइल रहे।
लइकवे चुप्पी  तुडत कहलन - ठीक बा।अब हम चलतानी। जे होई खबर कर देब त हमरो के त अपना घरे बतावे के  होई? परिवार के त रसम खातिर  बोलावल जरूरी होई। सब लोग के बोलावे के  पड़ी ।एह से तनी जल्दिये आपन जबाब देब।
बाबूजी बात के संभारत कहलन- ठीक बा। हमनी के  पंडी जी के बोला के रउरा के फेर  फोन  करब।
लइका के जाते बाबा के बोलिये बदल गइल- ई लइकवे हमनी के अँखिया के  परदा हटइले बा। सांचही कहत रहे जब हमनीये के पाउडर लगा के करियापन मेसे के चाहतानी त जे ले जाई ओकरा मिलावट लउकी ना का? एकदम लइका सोना बा। नन्हकी खातिर अब इहे लइका के हम मान लेनी। केतनो दहेज मांगी त हम कहियों से जोगार करके देब लेकिन  एही लइका हमरा पसंद  बा।
बाबा ओही घरी बाबूजी के कहलन- फटफटिया निकाल। अभी ऊ पड़ाव पर होईहें। चलऽ,चलऽ 'हँ ' कह दिहल जाव आ परोसियो के घरे मिठाई  दे देहल जाव।
बाबा आ बाबूजी फटफटिया लेके बस अड्डा  चल गइनी। नन्हकी के  माई नन्हकी के  झट से चुम्मा ले लेहली आ ओकर हाथ पकड़ के कुलदेवता के आगे  माथा टेक दिहली। गोर लागके अपना मन के सब बात कहे के शुरू  कइली- ए कुलदेवता! हमरा के माफ करीं। राउर दिहल बेटी के  हम कम बुझनी। तबहुं रउरा हमरा ऊपर किरिपा कइनी। लइका एतना सुघड़ भेजनी। हमरा के माफ क दीं। लोर त रूके के नामे ना लेत रहे। माई के रोवत देख के नन्हकियो सुड-सुड करे लागल। तब नन्हकी के  माई के धेयान टूटल- ए बाछी! आ तु काहे रोवतारू। हमहीं त तहरा संगे नाइंसाफी कइनी। हमरा के माफ कर दऽ। आ अब रोव मत। देखऽ मुँह कइसन हो गइल। बाबा 'हँ 'कहे गइल बारन ।जल्दिये दिनो धरा जाई। फेर हमार चिरई उड़ जईहेऽऽ। कहते-कहते फेर लोर बहे के शुरू हो गइल ।तबले दादियो धीरे धीरे पहुंच गईली आ कहे लगली- आजे रो लेबु लोग काऽ? रहे दऽ अब। बिदइयो खातिर तनी बचा के रखऽ लोग। आ चलऽ तनी बढ़िया चाय बनावऽ आ तनी हलुवो बना के मोहल्ला में  बाॅट दऽ। बाकिर अभी केहु के  कुछ बतइह मत ।छेका हो जाव त बता दिहल जाई।
तीनो लोग  माथ टेक के देवता घर से निकल के भंसारघर में  पहुँच गइली। नन्हकी के माई शुद्ध घीव मे सूजी भूंजे लगली। आज हाथ के चूड़ी कुछ तेजेऽ खनखनात रहे आ गावत रहली- गाई के गोबरे महादेवऽऽ.............।दादियो खटिया पर बइठ के  नाक से सुर में  सुर मिलावे लगली। नन्हकी मनही मन मुसकात रहे। नन्हकी के माई आज आपन बेटी पर मनही मन धधात रहली। ई उनकर जियरे देख सकत रहे। हलुवा के  खुशबू  से पूरा घर महक गइल। अब दोसर गीत शुरू हो गईल-  बड़भाग हमरो करब कन्यादान हे माई।बेटी भगमनिया मिलले सीरी राम हे माई.....................।

Saturday, 1 January 2022

गिरि से गिरकर पाषाण खण्ड,फिर कब पर्वत हो पाते हैं।16+16=32 मात्रा

नमन गुरुदेव


16+16=32 मात्रा
गिरि से गिरकर पाषाण खण्ड,फिर कब पर्वत हो पाते हैं।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं ।।
तिनका तिनका चुन घर बनता, भावों से ग्रंथन होता है,
क्षत स्नेह सदा विग्रह कारी, अनुभव से मंथन होता है,
अपनों का मान अगर टूटा, फिर गैर वही हो जाते हैं।।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं।। ।।

हर शब्द मंत्र सा फलित रहे,हर वाक्य घोष जयगान बने।
अंतर में करुणा,दया रहे, चितवन मृदुतम मुस्कान सने।
अज्ञान अगोचर मूढमना, बंजर में फूल उगाते हैं।।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं।। 

टूटे पत्ते अवलंब बिना, हो जीर्ण-शीर्ण रजकण बनते,
नदियां सागर झरने निर्झर, निज रूप बदल जलकण बनते।।
है जरा मरण कटु सत्य सुनो, आते न कभी जो जातें हैं।।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं।। 

प्रश्नों का हल सब मिल जाए, कहना यह मुश्किल है साथी,
संपूर्ण ज्ञान हो मानव को,  बहलाना यह मन है साथी,
सच-झूठ सदा कहता अंतर,भ्रमजाल सदा भरमाते हैं।।
।

Monday, 20 January 2020

भोर मनसा की

लघुकथा आयोजन 2020
 शीर्षक:- भोर

भोर हो रही थी।सूर्य अपनी लालिमा लिए उदित हो रहा था। मनसा भी अपने गुलाबी गालों पर पानी के छींटे मारकर खिल उठी।अहा! आज बहुत मजा आएगा। स्कूल में मेरी प्रस्तुति सबसे बेस्ट होगी! हूऽऽऽऽ ला लाला ला............ गाती हुई झटपट अपने काम निपटाकर स्कूल चल पड़ी। माँ ने कहा- डब्बे में गुड़ है और रात की एक रोटी भी बची है, खा ले। माँ ऽऽ! तू क्या खायेगी?मनसा जोर से चिल्लायी। मेरी फिकर मत कर! तू जा। तू मेडल लायेगी न तो मेरा पेट बिन खाये ही भर जायेगा।जा जल्दी जा.....।
    मनसा की प्रस्तुति बहुत  अच्छी रही।खूब तालियाँ बजी। पर पुरस्कार किसी और को मिला।मनसा थोड़ी दुःखी हुई पर अपने आप को संभाल लिया। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सब लौट रहे थे।मनसा भी थके पाँव घर  लौटने लगी।अब उसे भूख भी लगी थी पर उसकी इच्छा ही मर गई थी। उसका मन बार बार उससे झकझोर कर पूछ रहा था- क्या गरीब को मेडल पाने का भी हक नहीं? माँ को क्या कहूँगी? सोचती हुई थके पाँवों को घसीटते हुए  घर की तरफ अन्यमनस्क होकर जा रही थी।अचानक पीछे से आती कार उसके समीप रूकी और एक महिला ने पुकारा- ओ बिटिया!  रूको। मनसा ने पीछे मुड़कर देखा, जजसाहिबा थीं ।तनिक मन मलिन हुआ पर वह रुक गई । उन्होंने कहा-  आओ। मेरी गाड़ी में  बैठो।मैं तुम्हारा घर देखना चाहती हूँ । पहले तो उसने मना किया पर उनके दुबारा कहने पर मनसा कुछ  कह न सकी। 
घर पहुंच कर  जजसाहिबा ने मनसा की माँ से मनसा को अपने नृत्य कला केन्द्र में निःशुल्क शिक्षा देने की बात कह मना ली। मनसा समझ गई कि जजसाहिबा अपनी गलती सुधारने का मौका पाकर खुश थीं ।मनसा भी फिर भोर के सूरज के आने की इंतजार में आखों में ही रात बितायी।भोर फिर  ऊर्जा के साथ  उदित हुआ ।

Wednesday, 1 January 2020

बंजारा

 आज फिर बंजारे ने घर के दरवाजे पर पहुँचकर इकतारा पर धुन बजाना शुरू ही किया था -'हंसा के तोरे संग मे जाई.............।' चुप, चुप, बिल्कुल चुप! मैं  तुम्हारी बातों में  कतई न आनेवाली।आँसू पोछते हुए हंसा न जाने क्यों तिलमिला उठी।मैं आश्चर्य से उसकी ओर देख रही थी क्योंकि वह ऐसी न थी। जब उसकी नजर मुझपर पड़ी तो वह न जाने क्या  ढूँढने लगी।मैंने पूछा-  क्या हुआ?  उसने कहा-  मेरा सामान नहीं मिल रहा। क्या? क्या ?नहीं  मिल रहा ! अरे तू चुप रह ना! खीझते हुए हंसा ने कहा।  बंजारे ने फिर से बजाना शुरू किया- हंसा..........। अब हंसा का दर्द उफान पर था।वह दौड़ती हुई बाहर आई और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाकर कहा- हाँ ! नहीं जाना तेरे साथ । तू बंजारा है दर -दर भटकना तेरा जीवन है। मै नहीं भटक सकती।मैं  बड़े बाप की बेटी हूँ और तू .... तू ठहरा बंजारा।मेरा-तेरा मेल नहीं । इसीलिए तो एक रईस के साथ मेरा ब्याह हुआ।
भाग्यवशात्  वैधव्य और एकाकी जीवन जी रही हूँ ।समझा............? जा न! कहते-कहते फफक कर रो पड़ी।उसे रोता देख बंजारा दुखी हो उठा और फिर इकतारा बजाता निकल गया।

Monday, 30 December 2019

नयासाल

 गर  साल पुराना चला गया तो नया साल भी आएगा
आना जाना तो नियति है  नियन्ता इसे दुहरायेगा।।

हम मानव हैं हमें भले-बुरे का ज्ञान होना चाहिए 
वरना समय कभी रुकता नहीं तो फिर पीछे पछतायेगा।।

जो छूटा नहीं था वह अपना जो पाया है वह मेरा है
अब जो कुछ भी है मिला उसे पाकर आगे बढ जाएगा।।

जो हुआ तुम्हारे भाग्य बदा जो मिला तुम्हारा नसीब था।
जिस तरह गुजरा गुजर गया यह सोच तुम्हें सीखाएगा।।

बदला है साल बदलने दो इसका तो बदलना नियति है 
पर तुम न बदलना मीत मेरे यह जीवन फिर ना पाएगा




Friday, 27 December 2019

तुम और हम

सात फेरे सात वचन
सारी दुनिया तुम और हम
वादा किया बराबर हम
साथ चलेंगे तुम और हम।।

देह का नाता पहले आया
नेह पगा मन महल बनाया।।
खटपट-अनबन बातें बंद 
गायब हो गये श्रृंगार के छंद।।

टूटे वादे सारे वचन
इसके कारक तुम और हम।।

घर का मतलब कहीं खो गया
जीवन अपना जहर हो गया 
पांत का भोजन गायब पाया
एकाकी जीवन  अब आया।।

कहाँ गया वह स्वप्न सलोना
जिसमें थे बस तुम और हम।।

तू और तू बस तेरा वचन
मैं हूँ मुझमें कहता है मन
यही मिजाज कराता अनबन
रिसता घाव बन जाता जीवन।।

 नरक द्वार को खोला जिसने
कर्ता इसके तुम और हम।।



Sunday, 11 November 2018

सातहीं घोड़ा

सातहीं घोड़ा पर सवार सुरूजदेव अइले अटरिया।
हाथ जोड़ी पनिया में ठारी तिवइया सुमिरेली देव के अपार, सुरूजदेव अइले अटरिया।
लाली किरणिया तिवइया के चुनरी, झालर लागल गोटेदार, सुरूजदेव अइले अटरिया।
जोड़े कलसुपवा से पूजे तिवइया दुधवा के अरघ दियाय, सुरूजदेव अइले अटरिया।
नइहर सासुर मांगे तिवइया पायल के रूनझुन झंकार,
सुरूजदेव अइले अटरिया।
घोड़वा चढन के बेटा मांगे आंगन परिछन के दामाद,
सुरूजदेव अइले अटरिया।
अपना के मांगेली अवध सिंधोरवा, नइहर में  भाई के  दुलार।

Tuesday, 12 June 2018

हौसला

बारिश की बूँदें बगीचे के पत्तों पर छत के कोर से टपक कर धरती पर बिखर जा रही थी ।हरे पत्तों पर चमकले पानी की बूँद का छिटकना फूलझड़ी सी शोभायमान हो रही थी। मैं  ध्यानमग्न इस दृश्य को देख रही थी ।हवा के  संयोग से पत्तों का हिलना उनके खुशियों का सहज संकेत सा लग रहा था।अचानक एक छोटा सा कीट अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद करते हुए उन पत्तों पर चढने का असफल प्रयास करते दिखा।बारिश की रफ्तार भी धीमी हो चुकी थी । रह रहकर अब भी  छत से पानी टपक रह था।
कीड़ा धीरे धीरे टहनी पकड़ कर पत्ते पर चढने की कोशिश कर रहा था।जब तक वह वह टहनी पकड़ कर पत्ते के पास पहुचता पानी की एक बूँद ऊपर से टपक जाता और वह पुनः फिसल कर नीचे पहुंच जाता ।अपने बचाव की कोशिश में वह किसी प्रकार टहनी पकड़ कर चिपक जाता। फिर ऊपर आने की कोशिश में लग जाता। कई बार ऐसा  करने पर भी असफल होने पर मैंने सोचा अब वह अपना रास्ता बदल लेगा पर फिर उसे मैंने ऊपर आने का प्रयास करते देखा ।मैं समझ गई कि यह जिद्दी प्रवृत्ति का है। मेरी उत्सुकता और बढ रही थी उसकी प्रवृत्ति जानने की कि आखिर कबतक यह प्रयास करेगा।अपने लक्ष्य के प्रति वह कितना समर्पित है? वह मानव तो नहीं,  है तो एक कीड़ा।
अतः पास में ही कुर्सी लगाकर बैठ गयी और बड़ी ही तन्मयता से उसकी हरकत को देखती रही। खैर! धीरे धीरे वह फिर गति करता दिखा।पुनः वह अपना प्रयास शुरू कर दिया ।पर अब उसकी गति मंद हो चली थी। अब यह साफ पता चल रहा था कि उसमें  हिम्मत अब बिलकुल नहीं थी पर फिर भी कोशिश कर रहा था जिससे स्पष्ट हो रहा था कि उसकी इच्छाशक्ति अब भी बुलंद है।
अंततोगत्वा वह किसी प्रकार पत्ते पर आ पहुँचा । मैंने सोचा कि अब वह फड़फड़ायेगा या उड़ेगा या फिर  अपने विजय पर नाचेगा।पर यह क्या?  वह तो चित्त हो गया। अब कोई सुगबुगाहट नहीं थी। मैंने समीप जाकर एक लकड़ी से हिलाकर देखा। वह कीड़ा स्थिर हो चुका था। ऐसा लगा कि वह वीरगति को प्राप्त किया होया फिर उसकी हिम्मत नहीं टूटी थी मगर साँसें जरूर रूक गई थी।
जाते जाते वह क्षुद्र कहलाने वाले कीड़े ने हमें एक सुंदर सा सबक सीखा दिया था ।इच्छा शक्ति के आगे बूँद की टपक भी थककर बंद हो गई थी ।
सच,

पहिलका डेग- अशोक कुमार तिवारी

भोजपुरी माटी के अमर सपूत मा0 जनेश्वर मिश्र जी के धरती पर श्री अवधेश तिवारी जी के  घरे एगो कलम के चित्रकार के जनम भइल जेकर रंगमंच कबहुं कोर्ट बनल त कभो कागज आ कलम। पहिलका किताबे कवि जी के पहिलका डेग भले ही बा पर एही में सब विषय के समेट के आपन डेग के छाप अइसन छोड़ले बानी कि सबरंग रच गईल। ई सब देख के कवि अशोक कुमार तिवारी जी के सुंदर लेखनी के भविष्य साफ हो जाता।
                      ' पहिलका डेग' नाम से ही साफ पता चलताऽ कि कवनो रसिकानंद के पहिल पहिल  परोसल कुछ  होई। हँ! त अशोक कुमार तिवारी जी के पहीलका काव्य संग्रह ह ई।सताइस कविता के पहिलका डेग में  कवि समेट के सिरजन संसार के सब रूप देखवले बानी।
काव्य परम्परा के निरवहन करत कवि जी के आपन पहिलका रचना भगवान के आगे आशीर्वाद के खातिर लिखल मंगलाचरण बा।देश के महानता, गरीबी, सामाजिक कुरीति, चेतावनी, समय के महत्व, भोजपुरी भाषा के मिठास,  बोली के विविधता, तथा सम सामयिक शौचालय, दूष्कर्म, पुरनका खेल आ नवका जुग के  बदलाव से गाँव के छवि के छोट भइला के  दुख आदि  विषय के शामिल कइल गईल बा।
अशोक कुमार तिवारी जी के ई पहिलका डेग उनकरा कला के बारे इहे कहता कि पुत के पाँव पलनवे में  बुझा जाला। आज के बदलत परिवेश में निमन-बाउर दुनो विचार राउर लउकता।राउर सोच साँच के एकदम लगे बूझाता।
कविता संग्रह में कविता के विविध रूप लउकता।गीत, गजल, भजन, कुंडलिया,हाइकु,सेनस्यू, दोहा के रूप में लिखल बा।
लुंड़ा,चिरउरी,सउरी, मथानी आ नेनुआ के झीखुर आदि शब्द भोजपुरी भाषा के गरब रचऽता।

अइसे त रउरा लड़काईंये से कविता के रसिक बानी।बाकिर राउर कलमिया नवका पीढियन के  बदलल रूप आ इस्टाइल के भी 'गाँव होई नापाता' में जे तउल कइल गईल बा , बड़ सुंदर बखान बा।ओका- बोका के चिऊंटा मामा, घुघुआ मामा, छुतुड़ी, गुली डंटा, लंगड़ी बिछिया, कितकितवा आदि पारंपरिक खेल भी राउर बिषय बा।गरीबी के दरद के जाड़ा आवे से पहीलहीं तईयारी के सपना के अपना बेटा के धीर धरावत एगो बाप के बड़ सुंदर पीर बाँचल  गइल बा।  कवि जी बाढ के  कारण गंगा के लहरीये से उनकरा खउलला के कारण जाने के चाहत बाड़न । आदमी के बोली से जे ऊंच-नीच हो जाला इहो विषय पर चर्चा कइले बानी।
कुल मिला के कहल जा सकेला कि समाज के कवनो अंग  अशोक जी सेबाकी नइखे। मोबाइल के बारे में वर्तमान समय के स्थिति पर भी खूब सुंदर विचार बा।
बाकिर एक बात कहे के चाहत बानी कि आपन बात कहे खातिर अशोक जी कविता के नियम भा सौंदर्य के भी नकरले बानी। कहीं हिन्दी भाषा के मेल करके आपन कविता के गति देवे के कोशिश कइले बानी त कही भोजपुरी में  रूढ शब्द भी जुड़ल। मोबाइल फोन एकर बड़का उदाहरण बा।

Wednesday, 16 May 2018

सपना

आगे आगे जाइब हम पीछे कबहुं ताकब जी।
दुसरे के हम अंगना झाकब अपने मन ना झाकब जी।।

चीन जापान के  पुल देख के हमहुं पुल बनाइब जी
कइसे बनीहें बिना विचारे काम शुरू हो जाई जी।।
देश  बढइबै ई कुल करबै चाहे जइसे बनवाइब जी
बनही बेरिया ढह जाई त अनके लाग लगाइब जी।।
देश के लोगवा मरी जइहें त लोगवा लोर बहाई जी
फेर दोषवा केकरा पर जाई कोई कह नाही पाई जी।।
जायेवाला चली गईले अब ऊ ना लऊट के आई जी
कुछ दिन हल्ला-गुल्ला होई सबकुछ फेर भुलाई जी।।अइसे लोगवा आगे जइहें अइसही पीछे होई जाई जी
बिना ग्यान के हुनर देखइहें फेर घटना घट जाई जी।।
गाड़ी-घोड़ा इहें रही जइहें लोगवा मारल जाई जी
बिन यमराज के नेवता दिहले उनका घरवा जाई जी।।
कहेला मनवा मोरे मनई अपना मन के जगाईं जी
नाहीं त घटना रउरो दुअरा कबहुंओ एकदिन जाई जी।।
कुछुओ करहुं अपना मउआर के अँखिया में बसाईं जी
तब दुनिया के दुर्दिन देखे कोई कबहु ना जाई जी।।

Sunday, 31 December 2017

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

🔚साल बदल रहा है ।बीते पल  के जहाँ कड़वाहट भरे पल दुःखी कर देते हैं तो वही सुखद पल इस साल को याद कर एक सुकून प्रदान करते हैं । मन गलतियों को सुधारने की मन ही मन शपथ लेता है पर एक साल बीतते बीतते हम पुनः कई अलग प्रकार की  गलतियाँ कर बैठते हैं ।इसी प्रकार  साल दर साल  बदल रहा है ।
   🌚🕛⏳साल बदल रहा है और हम भी बदल रहे हैं ।हमारे साथ  धरती आसमान प्रकृति और पर्यावरण सब में  बदलाव हो रहा है । ईश्वर के इस नियति को हम स्वीकार  कर निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं ।👋🎎
उपरोक्त बातें  सब जानते हैं । मन खुश हो तो बातें अच्छी एवं सुकून देने वाली होती हैं और मन दुखी हो तो सामान्य सी बातें भी मन को  दुःखी कर जाती हैं।
सब रिश्तों को  पहचानते हैं पर मन पर हम अक्सर हम स्वयं हारते और जीतते हैं । हर मनुष्य का भाग्य विधाता की देन है । कर्म मानव का खुद का गढा हुआ भाग्य है।✊👊💺
चलिए । कोई  बात नहीं ।अब  मनःस्थिति को समझने की  कोशिश करने का प्रयत्न तो नववर्ष में करें । सुंदर एवं सार्थक प्रयास हमें  सुकून देंगी ।  कमियों को  नजरअंदाज कर  अच्छे पलों को जीवन से जोड़े रखें ।
आने वाले नववर्ष   पर भगवान की कृपा बनी रहे ।
🚻🕉 ⛤ भ से भगवान ऐसे ही  सरूप लिए  भैया भाभी, ग से  गुरु  अर्थात  समस्त  गुरुजन , व से वात्सल्य सरूपा नन्हे- नन्हे बच्चे👭👬👫 तथा न सरूपा समस्त  नर और नारी  💑को आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।🎂
  📣बीता हुआ  कल  बीत गया यह सुकून है ।
आने वाला कल बेहतर होगा यही जुनून है ।🔊
शुभकामनाओं के साथ 👈🙏🙏✍

नूतन सवेरा नया पैगाम लाया है
नववर्ष का नया उपहार लाया है
मिटाकर गिले शिकवे साथी
आगे बढ़ें संदेश लाया है।

Sunday, 10 December 2017

साथी

मुझको मेरे नाम बुलाये
   नाम  बुला कर याद  दिलाये
बचपन में मुझको ले जाए
साथी मेरा वो कहलाए।

अमिया इमली स्वाद चखाए
नदिया ताल पहाड़  घुमाए
पेड़ की ऊॅची डाल  चढ़ जाए
जामुन बेर नीचे टपकाए
साथी मेरा वो कहलाए।

लड़कर भी जो चैन नहीं पाए
तीखी  वाणी से बेधते जाए
पर नजरें  मुझपर ही जमाये
मान भी जाओ बोल न पाए
साथी मेरा वो कहलाए।

बुरे वक्त का सच्चा  साथी
झूठ को सच में बदले साथी
भाग्यवान ही साथी पाए
साथ  रहेंगे सदा कहता जाए
साथी मेरा वो कहलाए।

सुख में वो संग में  इतराए
रूत बदले पर वो संग आए
दोस्त बन दीपक जलाए
अंधियारा को वो मिटाये
साथी मेरा वो कहलाए।

Sunday, 3 December 2017

नया साल

गया पुराना साल नया साल  आएगा
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।

नये वर्ष से  नयी उम्मीदे, सबकुछ  सुंदर सुमधुर हो
जो बीत गया हो भूल उसे नूतन करने का अवसर हो
ऐसा रूप अनूप बनाये हर दिन आएगा ।
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।।

गर आए संघर्ष कभी तो हिम्मत उससे दूनी हो
बाधाएँ चाहे जैसी हो मन के भाव जुनूनी हो
बनकर नैया पार कराने साल आएगा ।
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।।

बिछुड़े मिल जाएँ अपनों से दूरी पास बने फिर से
फूलों सा कोमल हो जीवन खुशबू बिखरे जीवन में ।
सबकुछ प्यारा प्यारा लेकर साल आएगा ।
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।।

Saturday, 11 November 2017

क्या भूलूॅ क्या याद करूँ

क्या भूलूँ क्या याद करूँ
जीवन से होकर निराश
थक गए कदम
अगणित कड़वे खट्टे  अनुभव
पाषाण कर गयी ह्रदय
उभरी लकीर स्पष्ट अनगिनत
कहती मन की  व्यथा सहज
है विवश यह प्राण आन
मौन साधे मजबूर
सबकुछ  यकायक  बदल गया
संस्कार कहीं  खो गए
संस्कृति भटक रही
अपनी पहचान की खोज में
अपने पराये हो गये
बूढ़े  अनाथ और  असहाय
बच्चों का बचपन  डिजिटल होकर रह गया
सब अस्त व्यस्त  त्रस्त हैं
पाने की खोज में
खोते जा रहे हैं
पर एक आस बँधी है
कभी कोई आएगा
नवयुग का नवप्रवर्तक बनकर
फिर से भारत का नवनिर्माण करने।


Thursday, 2 November 2017

चाँद

उतरा  गगन में  चाँद अपने  शबाब में
धरती भी झूमती है इसे देख  अदा में ।
लहरें भी  उफनती हुई अम्बर को छू रही
साकी नशे में  झूमे  जैसे  मयकदा में ।
सबकुछ है स्निग्ध शांत नहीं भी कहीं  हलचल
बस दिल नहीं  है बस में खयाल- ए-जहाँ  में ।
चंदा को  देख  चांदनी इतरा रही है  आज
पूनम की  रात  छा गई  है आसमान में ।
है दाग चाँद में मगर पूनम का साथ है
मिलकर चमक रहे हैं दोनों  याराना में ।

Saturday, 30 September 2017

आस्था

बज रहे नगाड़े ढोल
मन हुआ  अनुरागी
शांत स्निग्ध सुरभित
कण कण में देवी विराजीं।

शक्ति की उपासना
मंत्र -मंत्र  जागृति
चेतना मिसाल जली
भक्ति लगन लागी।

पाप- दोष दूर हुए
अहं -ईर्ष्या  भागी
मैं और तुम एक ही हैं
सरस जगत लागी ।

आस्था की डोर
बच्चों की शोर
जगमग जहान हुआ
सुंदर छवि  लागी

Monday, 13 February 2017

बसंत

आम बौरा  गया
फूले सरसों के फूल
प्रकृति को पीली चूनर ओढा
पलाश का आकाश बना
कल्पना की डोली सजा
न जाने कहाँ कहाँ ले जाती
नव पल्लव नव रंग के फूल
स्वागत को तैयार
बान्दना बना
कोयल की तान सुना
मन को आत्मविभोर कर देती
बरबस मन बावरा हो जाता
सचमुच  बसंत  आ गया ।

Saturday, 21 January 2017

आईना

किस तरह खुद को कोई  मनाता है।
आहट जरा सी हो तो जाग जाता है ।
हरेक लम्हा इतना पीछे चला जाता है
कि लौटने कई साल बीत जाता है ।
हवा भी खूब शरारत करे  करीब  आकर
सपन है या फिर  हकीकत समझ न आता है ।
गौर से देखती हूँ खुद को जब
दिल में सोया हुआ अरमान जाग जाता है ।
खूबसूरत लगे मेरा साया
अक्श में आईना साफ नजर आता है ।