Sunday, 21 June 2026

नन्हकी के माई

आज भोरही से मड़इया में  खुबे आवाजाही लागल रहे। नन्हकी के माई आज अँकवार से बाहर निकल जात रहे। बड़की चाची  जब खिसियास त उ घरी तनी घुघटा के  सरका के कहस- ए अम्मा जी! बहरिया कोई ना रहल ह। आ नन्हकी के कबे से कहत रहनी ह सुनऽते नइखे त हाली-हाली निपटारा करे खातिर ............. एतने में - 'अच्छा , अच्छा, ठीक बा। जा घरे 'बड़की चाची के  ऐलान सुनते  ऊ भीतर चल गइली।
  ए नन्हकी ! सुन ! साबुन से बढिया से मुँह धोके पउडरवा तनी लगा लीहे। अबकी तोर मुँहवा साफा लागता । ई जे एक महीनवा हरदी चनन लगइलिस नु। एही से नीक लागता। काहे से कि लइकवा तनी साफा बा।
लइका खूबे पढल- लिखल बा। सुने में आइल ह , जे उ कहले बा कि लइकिया पढ़े में तेज होई ,आ हमरा मन के उपजल सवाल के उत्तर दे दीही त ओही घरी 'हॅ' कह देब। ए पीर बाबा! ए गंगा  माई! ए देवरहवा बाबा! रउरा के गोर लागतानी। नन्हकी के  अबकी बियहवा फाइलल करा दीहीं। रउरा हमरा के बेटी दिहनी एकर दुःख हमरा नईखे लेकिन रंगवा रऊरा एकदम दब देहनी ए बात के दुःख बा। हम सेर भर लइचीदाना चढ़ाइब। शीतला माई के  मंदिल जाइब । केकर-केकर ताना केतना सुनब ।ई हमार बनावल दोष त ना ह बाकिर राउरे दिहल बा त रऊरे किरिपा करींऽ।बोलते-बोलते नन्हकी के माई के पसेरी भर लोर गिर गइल  ।

ऐ माई! ऐ नन्हकी के माई! निकल बहरी। देख । आ गइल लोग।  नन्हकी के  बाबूजी दुअरे से हाक मरलन त नन्हकी के माई के देह मे एगो अलगे किसिम के फुरती आ गइल।
आरे ए माई! कहाँ बानी। ओसरवा में जाईं। आ गइल लोग। 'ठीक बा'- कहते माई ओसारा में  बिछल खटिया पर जाके बईठ गइली। जोर से कहे लगली- एजी! हेने ले आईं । बहरिये सब बात हो जाई का? एहजी नस्तवा ठंडा जाता। माइयो अपना माथा के अँचरा तनी आगे सरकवली  आ कहते-कहते  बहरिये चल गइली। चलीं, चलीं आईं । अब  नस्ता के  संगही बातो होई।
ओकरा बाद  सब कोई  ओसारा में  आ गइल।
नन्हकी के माई जब नन्हकी के  लेके अइली त लइका ओकरा के टकटकी लगा के देखे लगलन। सब कोई ई देख के एक दोसर के मुँह देखे लागल।
नन्हकी के  माई सीन बदले खातिर कहली- आ सब अबहीं ले धइले बा ।लीहीं ना बउवा।
हूँ ऽऽ। अब आइल बानी त खाइये के  जाइब। बाकिर तनी नन्हकी  से अकेलहूँ में कुछ पूछे के बा- लइका कहलन।
एतना सुनते बाबा जोर से  कहे लगलन- ऐरू-गैरू घर के हमनी बुझतार का। परदेशी के  जोर दिहला से हम लइकियो देखइनी ह ।ना त हमनी कीहां ई सब ना चलेला। हम अपना लइकी के एतना पढवनी त लइका भी त ओइसने चाहीं। एही से तहरा के  लइकियो देखा देनी ।अब अकेले का? जे पूछे के बा एही जे पूछ लऽ।
ठीक बा। हम एही जे पूछतानी -लइका कहलन।लेकिन  रउरा लोग  बीच में बात में मत घुसब।
एकरा बाद पढाई-लिखाई के बात भइल ।नोकरी करे के विचार पर बात भइल। अंत में लइका कहलन- अच्छा!  ई बताव। एतना मुँहवा में पावडर काहे लगइले बाड़ू। ई बात सुनते नन्हकी के माई बीचे में कहे के शुरू कइली- ना हमी तनी ऽऽऽऽ?लइका बीचे में रोक दिहलन ।
रउरा तनी चुप रहीं। हम नन्हकी से पुछतानी।
नन्हकी बिना कुछ कहले लोर ढरकावे लागल। ओकर लोर से नन्हकी के माई के लोर दुगुना गिरे लागल। लइका कहलन- रोव मत। जबाब द।
नन्हकी के  मुँह से एतने बड़ी मुश्किल से निकलल- माई कहलस।
लइका कहलन- जा मुँह धो के आव।  एतना सुनते बाबा आ बाबूजी त गरम होखे लगलन। दादी बुझ गइली। उ खुदे बाहर चल गइली ।आ बोलवली- सुनतानी जी। तनी हेने आईं । ऐ बबुआ! तुहूं आव।
ऐ नन्हकी के  माई! तनी दु गिलास पानी ले आव।
सब कोई धीरे-धीरे उहां से हट गइल। नन्हकी मुँह धोके अइली त लइका कहलन- देख! हमरा बनावटी लोग आ लीपल पोतल फयसनवाला मुँहवो पसन्द नइखे। बाकिर तहार सोच हमरा बहुते पसन्द आइल । अब  हम त अइसहीं बानी। जे कहे के बा सब साफ-साफ  कहेनी। तहरा हमार बात मिजाज ठीक  लागल त बोलऽ तहरा बाबा के हम 'हँ' कह के जाइब। नन्हकी के मुँह पर मुस्कान छा गइल। उ खाली आपन अँखिये  से लइका के  सबकुछ  कह देली। ओकरा बाद  लइका कहलन- तू जा अब। फेर  भेंट होई जल्दिये।
नन्हकी के जाते सब जन भीतर आ गइलन। का ऐ बबुआ! का भईल? पूछ लेलऽ नु। दादी कहते-कहते खटिया पर फेर बिराजमान हो गइली।
लइका कहलन- हमरा त लइकी पसन्द बारी। रउरा लोग तइयारी करीं।
का? का कहतारऽ ? तहरा घर में बड़ कोई नइखे का? बाबा बीचहीं में टोक देहलन।
लइका कहलन- बारन काहे ना। सब कोई  बा ।दादी-दादा माई-बाबूजी,मामा-मामी, चाचा चाची ,बुआ, मौसी सभे बा। लेकिन  ऊ लोग भी रऊरे लोग जइसन बारन। रंगवा के  लोभ उनहूं के मन में बा। गोर ऊहो खोजिहें त फेर का होई? हमनी के त बदल रहल बानी।लेकिन रऊरा लोग के कइसे बदलल जाव? सब के माई के गोरे लइकी आ गोरे पतोह चाहीं त करिया पैदा काहे करके बड़का करेनीऽ लोग। जनमते तनी नीमक चटा देतीं त झंझटे ना होइत। गोरका के जियावल जाइत।करियका के  ओही घरी मार देवे के चाहीं। सपाट बात लइका टन से कहलस।
आज त बाबा के कड़कदार बोलिया गाएबे हो गईल रहे। चुपचाप बइठले रह गइलन। अब कोई  कुछ ना बोलत रहे।  सब चुपचाप। ऊहां सन्नाटा पसर गइल रहे।
लइकवे चुप्पी  तुडत कहलन - ठीक बा।अब हम चलतानी। जे होई खबर कर देब त हमरो के त अपना घरे बतावे के  होई? परिवार के त रसम खातिर  बोलावल जरूरी होई। सब लोग के बोलावे के  पड़ी ।एह से तनी जल्दिये आपन जबाब देब।
बाबूजी बात के संभारत कहलन- ठीक बा। हमनी के  पंडी जी के बोला के रउरा के फेर  फोन  करब।
लइका के जाते बाबा के बोलिये बदल गइल- ई लइकवे हमनी के अँखिया के  परदा हटइले बा। सांचही कहत रहे जब हमनीये के पाउडर लगा के करियापन मेसे के चाहतानी त जे ले जाई ओकरा मिलावट लउकी ना का? एकदम लइका सोना बा। नन्हकी खातिर अब इहे लइका के हम मान लेनी। केतनो दहेज मांगी त हम कहियों से जोगार करके देब लेकिन  एही लइका हमरा पसंद  बा।
बाबा ओही घरी बाबूजी के कहलन- फटफटिया निकाल। अभी ऊ पड़ाव पर होईहें। चलऽ,चलऽ 'हँ ' कह दिहल जाव आ परोसियो के घरे मिठाई  दे देहल जाव।
बाबा आ बाबूजी फटफटिया लेके बस अड्डा  चल गइनी। नन्हकी के  माई नन्हकी के  झट से चुम्मा ले लेहली आ ओकर हाथ पकड़ के कुलदेवता के आगे  माथा टेक दिहली। गोर लागके अपना मन के सब बात कहे के शुरू  कइली- ए कुलदेवता! हमरा के माफ करीं। राउर दिहल बेटी के  हम कम बुझनी। तबहुं रउरा हमरा ऊपर किरिपा कइनी। लइका एतना सुघड़ भेजनी। हमरा के माफ क दीं। लोर त रूके के नामे ना लेत रहे। माई के रोवत देख के नन्हकियो सुड-सुड करे लागल। तब नन्हकी के  माई के धेयान टूटल- ए बाछी! आ तु काहे रोवतारू। हमहीं त तहरा संगे नाइंसाफी कइनी। हमरा के माफ कर दऽ। आ अब रोव मत। देखऽ मुँह कइसन हो गइल। बाबा 'हँ 'कहे गइल बारन ।जल्दिये दिनो धरा जाई। फेर हमार चिरई उड़ जईहेऽऽ। कहते-कहते फेर लोर बहे के शुरू हो गइल ।तबले दादियो धीरे धीरे पहुंच गईली आ कहे लगली- आजे रो लेबु लोग काऽ? रहे दऽ अब। बिदइयो खातिर तनी बचा के रखऽ लोग। आ चलऽ तनी बढ़िया चाय बनावऽ आ तनी हलुवो बना के मोहल्ला में  बाॅट दऽ। बाकिर अभी केहु के  कुछ बतइह मत ।छेका हो जाव त बता दिहल जाई।
तीनो लोग  माथ टेक के देवता घर से निकल के भंसारघर में  पहुँच गइली। नन्हकी के माई शुद्ध घीव मे सूजी भूंजे लगली। आज हाथ के चूड़ी कुछ तेजेऽ खनखनात रहे आ गावत रहली- गाई के गोबरे महादेवऽऽ.............।दादियो खटिया पर बइठ के  नाक से सुर में  सुर मिलावे लगली। नन्हकी मनही मन मुसकात रहे। नन्हकी के माई आज आपन बेटी पर मनही मन धधात रहली। ई उनकर जियरे देख सकत रहे। हलुवा के  खुशबू  से पूरा घर महक गइल। अब दोसर गीत शुरू हो गईल-  बड़भाग हमरो करब कन्यादान हे माई।बेटी भगमनिया मिलले सीरी राम हे माई.....................।

Saturday, 1 January 2022

गिरि से गिरकर पाषाण खण्ड,फिर कब पर्वत हो पाते हैं।16+16=32 मात्रा

नमन गुरुदेव


16+16=32 मात्रा
गिरि से गिरकर पाषाण खण्ड,फिर कब पर्वत हो पाते हैं।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं ।।
तिनका तिनका चुन घर बनता, भावों से ग्रंथन होता है,
क्षत स्नेह सदा विग्रह कारी, अनुभव से मंथन होता है,
अपनों का मान अगर टूटा, फिर गैर वही हो जाते हैं।।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं।। ।।

हर शब्द मंत्र सा फलित रहे,हर वाक्य घोष जयगान बने।
अंतर में करुणा,दया रहे, चितवन मृदुतम मुस्कान सने।
अज्ञान अगोचर मूढमना, बंजर में फूल उगाते हैं।।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं।। 

टूटे पत्ते अवलंब बिना, हो जीर्ण-शीर्ण रजकण बनते,
नदियां सागर झरने निर्झर, निज रूप बदल जलकण बनते।।
है जरा मरण कटु सत्य सुनो, आते न कभी जो जातें हैं।।
सँभलो,जागो,निजबोध करो,अवितथ स्वरूप खो जाते हैं।। 

प्रश्नों का हल सब मिल जाए, कहना यह मुश्किल है साथी,
संपूर्ण ज्ञान हो मानव को,  बहलाना यह मन है साथी,
सच-झूठ सदा कहता अंतर,भ्रमजाल सदा भरमाते हैं।।


Monday, 20 January 2020

भोर मनसा की

लघुकथा आयोजन 2020
 शीर्षक:- भोर

भोर हो रही थी।सूर्य अपनी लालिमा लिए उदित हो रहा था। मनसा भी अपने गुलाबी गालों पर पानी के छींटे मारकर खिल उठी।अहा! आज बहुत मजा आएगा। स्कूल में मेरी प्रस्तुति सबसे बेस्ट होगी! हूऽऽऽऽ ला लाला ला............ गाती हुई झटपट अपने काम निपटाकर स्कूल चल पड़ी। माँ ने कहा- डब्बे में गुड़ है और रात की एक रोटी भी बची है, खा ले। माँ ऽऽ! तू क्या खायेगी?मनसा जोर से चिल्लायी। मेरी फिकर मत कर! तू जा। तू मेडल लायेगी न तो मेरा पेट बिन खाये ही भर जायेगा।जा जल्दी जा.....।
    मनसा की प्रस्तुति बहुत  अच्छी रही।खूब तालियाँ बजी। पर पुरस्कार किसी और को मिला।मनसा थोड़ी दुःखी हुई पर अपने आप को संभाल लिया। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सब लौट रहे थे।मनसा भी थके पाँव घर  लौटने लगी।अब उसे भूख भी लगी थी पर उसकी इच्छा ही मर गई थी। उसका मन बार बार उससे झकझोर कर पूछ रहा था- क्या गरीब को मेडल पाने का भी हक नहीं? माँ को क्या कहूँगी? सोचती हुई थके पाँवों को घसीटते हुए  घर की तरफ अन्यमनस्क होकर जा रही थी।अचानक पीछे से आती कार उसके समीप रूकी और एक महिला ने पुकारा- ओ बिटिया!  रूको। मनसा ने पीछे मुड़कर देखा, जजसाहिबा थीं ।तनिक मन मलिन हुआ पर वह रुक गई । उन्होंने कहा-  आओ। मेरी गाड़ी में  बैठो।मैं तुम्हारा घर देखना चाहती हूँ । पहले तो उसने मना किया पर उनके दुबारा कहने पर मनसा कुछ  कह न सकी। 
घर पहुंच कर  जजसाहिबा ने मनसा की माँ से मनसा को अपने नृत्य कला केन्द्र में निःशुल्क शिक्षा देने की बात कह मना ली। मनसा समझ गई कि जजसाहिबा अपनी गलती सुधारने का मौका पाकर खुश थीं ।मनसा भी फिर भोर के सूरज के आने की इंतजार में आखों में ही रात बितायी।भोर फिर  ऊर्जा के साथ  उदित हुआ ।

Wednesday, 1 January 2020

बंजारा

 आज फिर बंजारे ने घर के दरवाजे पर पहुँचकर इकतारा पर धुन बजाना शुरू ही किया था -'हंसा के तोरे संग मे जाई.............।' चुप, चुप, बिल्कुल चुप! मैं  तुम्हारी बातों में  कतई न आनेवाली।आँसू पोछते हुए हंसा न जाने क्यों तिलमिला उठी।मैं आश्चर्य से उसकी ओर देख रही थी क्योंकि वह ऐसी न थी। जब उसकी नजर मुझपर पड़ी तो वह न जाने क्या  ढूँढने लगी।मैंने पूछा-  क्या हुआ?  उसने कहा-  मेरा सामान नहीं मिल रहा। क्या? क्या ?नहीं  मिल रहा ! अरे तू चुप रह ना! खीझते हुए हंसा ने कहा।  बंजारे ने फिर से बजाना शुरू किया- हंसा..........। अब हंसा का दर्द उफान पर था।वह दौड़ती हुई बाहर आई और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाकर कहा- हाँ ! नहीं जाना तेरे साथ । तू बंजारा है दर -दर भटकना तेरा जीवन है। मै नहीं भटक सकती।मैं  बड़े बाप की बेटी हूँ और तू .... तू ठहरा बंजारा।मेरा-तेरा मेल नहीं । इसीलिए तो एक रईस के साथ मेरा ब्याह हुआ।
भाग्यवशात्  वैधव्य और एकाकी जीवन जी रही हूँ ।समझा............? जा न! कहते-कहते फफक कर रो पड़ी।उसे रोता देख बंजारा दुखी हो उठा और फिर इकतारा बजाता निकल गया।

Monday, 30 December 2019

नयासाल

 गर  साल पुराना चला गया तो नया साल भी आएगा
आना जाना तो नियति है  नियन्ता इसे दुहरायेगा।।

हम मानव हैं हमें भले-बुरे का ज्ञान होना चाहिए 
वरना समय कभी रुकता नहीं तो फिर पीछे पछतायेगा।।

जो छूटा नहीं था वह अपना जो पाया है वह मेरा है
अब जो कुछ भी है मिला उसे पाकर आगे बढ जाएगा।।

जो हुआ तुम्हारे भाग्य बदा जो मिला तुम्हारा नसीब था।
जिस तरह गुजरा गुजर गया यह सोच तुम्हें सीखाएगा।।

बदला है साल बदलने दो इसका तो बदलना नियति है 
पर तुम न बदलना मीत मेरे यह जीवन फिर ना पाएगा




Friday, 27 December 2019

तुम और हम

सात फेरे सात वचन
सारी दुनिया तुम और हम
वादा किया बराबर हम
साथ चलेंगे तुम और हम।।

देह का नाता पहले आया
नेह पगा मन महल बनाया।।
खटपट-अनबन बातें बंद 
गायब हो गये श्रृंगार के छंद।।

टूटे वादे सारे वचन
इसके कारक तुम और हम।।

घर का मतलब कहीं खो गया
जीवन अपना जहर हो गया 
पांत का भोजन गायब पाया
एकाकी जीवन  अब आया।।

कहाँ गया वह स्वप्न सलोना
जिसमें थे बस तुम और हम।।

तू और तू बस तेरा वचन
मैं हूँ मुझमें कहता है मन
यही मिजाज कराता अनबन
रिसता घाव बन जाता जीवन।।

 नरक द्वार को खोला जिसने
कर्ता इसके तुम और हम।।



Sunday, 11 November 2018

सातहीं घोड़ा

सातहीं घोड़ा पर सवार सुरूजदेव अइले अटरिया।
हाथ जोड़ी पनिया में ठारी तिवइया सुमिरेली देव के अपार, सुरूजदेव अइले अटरिया।
लाली किरणिया तिवइया के चुनरी, झालर लागल गोटेदार, सुरूजदेव अइले अटरिया।
जोड़े कलसुपवा से पूजे तिवइया दुधवा के अरघ दियाय, सुरूजदेव अइले अटरिया।
नइहर सासुर मांगे तिवइया पायल के रूनझुन झंकार,
सुरूजदेव अइले अटरिया।
घोड़वा चढन के बेटा मांगे आंगन परिछन के दामाद,
सुरूजदेव अइले अटरिया।
अपना के मांगेली अवध सिंधोरवा, नइहर में  भाई के  दुलार।