Tuesday, 12 June 2018

पहिलका डेग- अशोक कुमार तिवारी

भोजपुरी माटी के अमर सपूत मा0 जनेश्वर मिश्र जी के धरती पर श्री अवधेश तिवारी जी के  घरे एगो कलम के चित्रकार के जनम भइल जेकर रंगमंच कबहुं कोर्ट बनल त कभो कागज आ कलम। पहिलका किताबे कवि जी के पहिलका डेग भले ही बा पर एही में सब विषय के समेट के आपन डेग के छाप अइसन छोड़ले बानी कि सबरंग रच गईल। ई सब देख के कवि अशोक कुमार तिवारी जी के सुंदर लेखनी के भविष्य साफ हो जाता।
                      ' पहिलका डेग' नाम से ही साफ पता चलताऽ कि कवनो रसिकानंद के पहिल पहिल  परोसल कुछ  होई। हँ! त अशोक कुमार तिवारी जी के पहीलका काव्य संग्रह ह ई।सताइस कविता के पहिलका डेग में  कवि समेट के सिरजन संसार के सब रूप देखवले बानी।
काव्य परम्परा के निरवहन करत कवि जी के आपन पहिलका रचना भगवान के आगे आशीर्वाद के खातिर लिखल मंगलाचरण बा।देश के महानता, गरीबी, सामाजिक कुरीति, चेतावनी, समय के महत्व, भोजपुरी भाषा के मिठास,  बोली के विविधता, तथा सम सामयिक शौचालय, दूष्कर्म, पुरनका खेल आ नवका जुग के  बदलाव से गाँव के छवि के छोट भइला के  दुख आदि  विषय के शामिल कइल गईल बा।
अशोक कुमार तिवारी जी के ई पहिलका डेग उनकरा कला के बारे इहे कहता कि पुत के पाँव पलनवे में  बुझा जाला। आज के बदलत परिवेश में निमन-बाउर दुनो विचार राउर लउकता।राउर सोच साँच के एकदम लगे बूझाता।
कविता संग्रह में कविता के विविध रूप लउकता।गीत, गजल, भजन, कुंडलिया,हाइकु,सेनस्यू, दोहा के रूप में लिखल बा।
लुंड़ा,चिरउरी,सउरी, मथानी आ नेनुआ के झीखुर आदि शब्द भोजपुरी भाषा के गरब रचऽता।

अइसे त रउरा लड़काईंये से कविता के रसिक बानी।बाकिर राउर कलमिया नवका पीढियन के  बदलल रूप आ इस्टाइल के भी 'गाँव होई नापाता' में जे तउल कइल गईल बा , बड़ सुंदर बखान बा।ओका- बोका के चिऊंटा मामा, घुघुआ मामा, छुतुड़ी, गुली डंटा, लंगड़ी बिछिया, कितकितवा आदि पारंपरिक खेल भी राउर बिषय बा।गरीबी के दरद के जाड़ा आवे से पहीलहीं तईयारी के सपना के अपना बेटा के धीर धरावत एगो बाप के बड़ सुंदर पीर बाँचल  गइल बा।  कवि जी बाढ के  कारण गंगा के लहरीये से उनकरा खउलला के कारण जाने के चाहत बाड़न । आदमी के बोली से जे ऊंच-नीच हो जाला इहो विषय पर चर्चा कइले बानी।
कुल मिला के कहल जा सकेला कि समाज के कवनो अंग  अशोक जी सेबाकी नइखे। मोबाइल के बारे में वर्तमान समय के स्थिति पर भी खूब सुंदर विचार बा।
बाकिर एक बात कहे के चाहत बानी कि आपन बात कहे खातिर अशोक जी कविता के नियम भा सौंदर्य के भी नकरले बानी। कहीं हिन्दी भाषा के मेल करके आपन कविता के गति देवे के कोशिश कइले बानी त कही भोजपुरी में  रूढ शब्द भी जुड़ल। मोबाइल फोन एकर बड़का उदाहरण बा।

Wednesday, 16 May 2018

सपना

आगे आगे जाइब हम पीछे कबहुं ताकब जी।
दुसरे के हम अंगना झाकब अपने मन ना झाकब जी।।

चीन जापान के  पुल देख के हमहुं पुल बनाइब जी
कइसे बनीहें बिना विचारे काम शुरू हो जाई जी।।
देश  बढइबै ई कुल करबै चाहे जइसे बनवाइब जी
बनही बेरिया ढह जाई त अनके लाग लगाइब जी।।
देश के लोगवा मरी जइहें त लोगवा लोर बहाई जी
फेर दोषवा केकरा पर जाई कोई कह नाही पाई जी।।
जायेवाला चली गईले अब ऊ ना लऊट के आई जी
कुछ दिन हल्ला-गुल्ला होई सबकुछ फेर भुलाई जी।।अइसे लोगवा आगे जइहें अइसही पीछे होई जाई जी
बिना ग्यान के हुनर देखइहें फेर घटना घट जाई जी।।
गाड़ी-घोड़ा इहें रही जइहें लोगवा मारल जाई जी
बिन यमराज के नेवता दिहले उनका घरवा जाई जी।।
कहेला मनवा मोरे मनई अपना मन के जगाईं जी
नाहीं त घटना रउरो दुअरा कबहुंओ एकदिन जाई जी।।
कुछुओ करहुं अपना मउआर के अँखिया में बसाईं जी
तब दुनिया के दुर्दिन देखे कोई कबहु ना जाई जी।।

Sunday, 31 December 2017

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

🔚साल बदल रहा है ।बीते पल  के जहाँ कड़वाहट भरे पल दुःखी कर देते हैं तो वही सुखद पल इस साल को याद कर एक सुकून प्रदान करते हैं । मन गलतियों को सुधारने की मन ही मन शपथ लेता है पर एक साल बीतते बीतते हम पुनः कई अलग प्रकार की  गलतियाँ कर बैठते हैं ।इसी प्रकार  साल दर साल  बदल रहा है ।
   🌚🕛⏳साल बदल रहा है और हम भी बदल रहे हैं ।हमारे साथ  धरती आसमान प्रकृति और पर्यावरण सब में  बदलाव हो रहा है । ईश्वर के इस नियति को हम स्वीकार  कर निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं ।👋🎎
उपरोक्त बातें  सब जानते हैं । मन खुश हो तो बातें अच्छी एवं सुकून देने वाली होती हैं और मन दुखी हो तो सामान्य सी बातें भी मन को  दुःखी कर जाती हैं।
सब रिश्तों को  पहचानते हैं पर मन पर हम अक्सर हम स्वयं हारते और जीतते हैं । हर मनुष्य का भाग्य विधाता की देन है । कर्म मानव का खुद का गढा हुआ भाग्य है।✊👊💺
चलिए । कोई  बात नहीं ।अब  मनःस्थिति को समझने की  कोशिश करने का प्रयत्न तो नववर्ष में करें । सुंदर एवं सार्थक प्रयास हमें  सुकून देंगी ।  कमियों को  नजरअंदाज कर  अच्छे पलों को जीवन से जोड़े रखें ।
आने वाले नववर्ष   पर भगवान की कृपा बनी रहे ।
🚻🕉 ⛤ भ से भगवान ऐसे ही  सरूप लिए  भैया भाभी, ग से  गुरु  अर्थात  समस्त  गुरुजन , व से वात्सल्य सरूपा नन्हे- नन्हे बच्चे👭👬👫 तथा न सरूपा समस्त  नर और नारी  💑को आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।🎂
  📣बीता हुआ  कल  बीत गया यह सुकून है ।
आने वाला कल बेहतर होगा यही जुनून है ।🔊
शुभकामनाओं के साथ 👈🙏🙏✍

नूतन सवेरा नया पैगाम लाया है
नववर्ष का नया उपहार लाया है
मिटाकर गिले शिकवे साथी
आगे बढ़ें संदेश लाया है।

Sunday, 10 December 2017

साथी

मुझको मेरे नाम बुलाये
   नाम  बुला कर याद  दिलाये
बचपन में मुझको ले जाए
साथी मेरा वो कहलाए।

अमिया इमली स्वाद चखाए
नदिया ताल पहाड़  घुमाए
पेड़ की ऊॅची डाल  चढ़ जाए
जामुन बेर नीचे टपकाए
साथी मेरा वो कहलाए।

लड़कर भी जो चैन नहीं पाए
तीखी  वाणी से बेधते जाए
पर नजरें  मुझपर ही जमाये
मान भी जाओ बोल न पाए
साथी मेरा वो कहलाए।

बुरे वक्त का सच्चा  साथी
झूठ को सच में बदले साथी
भाग्यवान ही साथी पाए
साथ  रहेंगे सदा कहता जाए
साथी मेरा वो कहलाए।

सुख में वो संग में  इतराए
रूत बदले पर वो संग आए
दोस्त बन दीपक जलाए
अंधियारा को वो मिटाये
साथी मेरा वो कहलाए।

Sunday, 3 December 2017

नया साल

गया पुराना साल नया साल  आएगा
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।

नये वर्ष से  नयी उम्मीदे, सबकुछ  सुंदर सुमधुर हो
जो बीत गया हो भूल उसे नूतन करने का अवसर हो
ऐसा रूप अनूप बनाये हर दिन आएगा ।
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।।

गर आए संघर्ष कभी तो हिम्मत उससे दूनी हो
बाधाएँ चाहे जैसी हो मन के भाव जुनूनी हो
बनकर नैया पार कराने साल आएगा ।
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।।

बिछुड़े मिल जाएँ अपनों से दूरी पास बने फिर से
फूलों सा कोमल हो जीवन खुशबू बिखरे जीवन में ।
सबकुछ प्यारा प्यारा लेकर साल आएगा ।
लेकर नया तराना नया साल आएगा  ।।

Saturday, 11 November 2017

क्या भूलूॅ क्या याद करूँ

क्या भूलूँ क्या याद करूँ
जीवन से होकर निराश
थक गए कदम
अगणित कड़वे खट्टे  अनुभव
पाषाण कर गयी ह्रदय
उभरी लकीर स्पष्ट अनगिनत
कहती मन की  व्यथा सहज
है विवश यह प्राण आन
मौन साधे मजबूर
सबकुछ  यकायक  बदल गया
संस्कार कहीं  खो गए
संस्कृति भटक रही
अपनी पहचान की खोज में
अपने पराये हो गये
बूढ़े  अनाथ और  असहाय
बच्चों का बचपन  डिजिटल होकर रह गया
सब अस्त व्यस्त  त्रस्त हैं
पाने की खोज में
खोते जा रहे हैं
पर एक आस बँधी है
कभी कोई आएगा
नवयुग का नवप्रवर्तक बनकर
फिर से भारत का नवनिर्माण करने।


Thursday, 2 November 2017

चाँद

उतरा  गगन में  चाँद अपने  शबाब में
धरती भी झूमती है इसे देख  अदा में ।
लहरें भी  उफनती हुई अम्बर को छू रही
साकी नशे में  झूमे  जैसे  मयकदा में ।
सबकुछ है स्निग्ध शांत नहीं भी कहीं  हलचल
बस दिल नहीं  है बस में खयाल- ए-जहाँ  में ।
चंदा को  देख  चांदनी इतरा रही है  आज
पूनम की  रात  छा गई  है आसमान में ।
है दाग चाँद में मगर पूनम का साथ है
मिलकर चमक रहे हैं दोनों  याराना में ।